सिक्का बदल गया ... और खेल भी..
स्मिता मिश्र
भारत में हाल
ही मेंविमुद्रीकरण किया गया। विमुद्रीकरण में किसी देश की सरकार किसी किसी पुरानी
मुद्रा को कानूनी तौर पर बंद कर देती है तो उस मुद्रा की कुछ कीमत नहीं रह जाती।
उस दौरान यदि नोट बैंकों में जाकर नहीं बदले या जमा नहीं किए जाते तो वे महज़ कागज
का टुकड़ा बनकर रह जाते हैं।
सरकार मुद्रा
की जमाखोरी और नकली नोटं से छुटकारा पाने के लिए बड़े राशि के नोटों का
विमुद्रीकरण करती है। आतंकवाद, अपराध और तस्करी जैसे आपराधिक कामों में
भी बड़े पैमाने पर नगद लेन-देन होता है।
खेलों में भी काला धन कई
तरह से काम करता है जैसे सट्टेबाजी मैच फिक्सिंग आदि।
भारत में 2013 में आईपीएल में सट्टेबाजी और स्पॉट
फिक्सिंग का खुलासा होने से खलबली मच गई थी। सर्वोच्च नयायालय ने बीसीसीआई में
पारदर्शिता और सुधार लाने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा की अगुवाई में
एक समिति बनाई थी। लोढा समिति ने भारतीय खेलों में सुधार लाने की कई
सिफारिशें की है, जिसमें खेलों में राजनीतिज्ञों की भूमिका पर
भी रोक लगानी की सिफारिश की है। दरअसल खेलों से राजनेताओं को एक रास्ता मिलता है
आम लोगों के साथ जुड़ने का। बीसीसीआई या अन्य खेल संघों की मदद से इन लोगों को
बहुत सारे धन के संचालन का मौक़ा मिलता है। यह रिश्ता खेल के बाहर भी फ़ायदेमंद
होता है क्योंकि इससे एक नेटवर्क बनता है।
नोटबंदी से खेलों में तात्कालिक समस्याएँ कई
आई जैसे रणजी खिलाडियों को नोट बंदी के कारण बी.सी.सी.आई. द्वारा टीए/डीए
नहीं दिया गया है। ऐसे में उन्हें खुद के खर्च पर क्रिकेट खेलने पड़ रहे हैं। खिलाड़ियों
को सबसे ज्यादा दिक्कत खाने की हो रही है, ऐसे में उनके प्रदर्शन पर असर
पड़ना तय है। समस्याएं तो कई आई है लेकिन अच्छी बात यह है कि खेलों में पारदर्शिता
के जो प्रयास लोढ़ा समिति कर रही है ,उसमें विमुद्रीकरण से
काफी मदद मिली है। क्रिकेट के जिस काले कारोबार को रोकने के लिए पुलिस नाकाम रहती
थी, वह अब बड़े नोट बंद होने के साथ ही चौपट हो गया है
क्योंकि सटोरिये इन्हीं काले धन से लेन देन करते हैं। नोटबंदी का असर सट्टा
बाजार पर भी पड़ा है। भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरिज में पैसा लगाने वाले
सट्टेबाज अब कम पैसा लगा रहे हैं। इसमें 75 फीसदी की कमी आई
है। मैच में प्रत्येक गेंद करोड़ों रुपयों की होकर गुजरती है। उसके बावजूद भी पुलिस
कभी सट्टेबाजों को पकड़ने में कामयाब नहीं हो पाती है।
ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे कड़े फैसले कड़ा समय भी
लाते हैं। यह सही है कि विमुद्रीकरण के फैसले से अनेकानेक असुविधाएं आम जनता को हो
रही हैं लेकिन कई बार लाइलाज बीमारियों का इलाज़ भी मुश्किल तरीके से होता है। देश
इस समय इसी मुश्किल इलाज़ से गुजर रहा है .. ज़रुरत है थोड़े संयम और धैर्य की।
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